उपदेश सार के ८वें प्रवचन में पू स्वामी आत्मानन्द जी ने बताया की जब किसी पुण्यात्मा ने अपने जीवन में भक्ति का आशीर्वाद प्राप्त कर लिया तो निश्चित रूप से उसका मन शान्त और सात्त्विक हो जाता है, लेकिन जब तक ईश्वर के चरणों में अनुराग प्राप्त नहीं होता है, तब तक मन इधर-उधर भटकता है। कई बार आँधियों और तूफ़ान आते हैं, ऐसे मन को कैसे निग्रहीत करा जाये। इसके लिए भगवान् यहाँ मन को शीघ्र शांत करने की एक विद्या देते हैं। वह है प्राणायाम। उसमे भी विशेष रूप से बाह्य कुम्भक। जब साँस बहार निकल कर थोड़ी देर रुका जाता है तो चुटकी में सब विचार रुक जाते हैं, और मन का लय हो जाता है। लेकिन यह क्षणिक होता है लेकिन मनुष्य को इसका लाभ अवश्य लेना चाहिए। हाँ अगर किसी को यह जिज्ञासा हो की मन के प्रवाह को स्वाभाविक रूप से शान्त कैसे किया जाये तो वे कहते हैं की इसकी भी साधना होती है। और वो है - एक का चिंतन और ज्ञान। इससे मनोनाश प्राप्त हो जाता है। लय और मनोनाश दोनों में वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं।